Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 111, Verse 40
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 111, verse 40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 111 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
कल्पान्तपवना वान्तु यान्तु चैकत्वमर्णवाः ।
तपन्तु द्वादशादित्या नास्ति निर्मनसः क्षतिः ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
अक्षय (जिसका नाश होना कठिन है),
अनवीन (अबाल यानी अभिमानी), मनरूप सिंह को जो कि संसार की वृद्धि करता है, जो
लोग मारते हैं, वे इस संसार में सबसे बढ़कर उत्कर्षं को प्राप्त होते हैं और अन्य लोगों को भी
उपदेश द्वारा निर्वाण पद देनेवाले होते हैं ॥३ ८॥
मन ही महाभय है और मन पर विजय ही अभय पद है, ऐसा कहते हैं।
संकल्परूपी क्लेश से बड़ी भीषण, भ्रान्ति उत्पन्न करनेवाली ये विपत्तियाँ मरूभूमिमें
मृगतृष्णिका के समान उत्पन्न होती हें ॥ ३ ९॥ भले ही प्रलय काल की वायु बहे, भले ही चारों समुद्र
एक हो जाय और भले ही बारह सूर्य एक साथ तपें, पर जिसके मन का शमन हो गया हे, उस पुरूष
की कोई भी हानि नहीं होती हे