Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 111, Verses 30–33
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 111, verses 30–33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 111 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
सति पथ्ये तते शुभ्रे चित्तोपशमनादृते ।
तिर्यगूर्ध्वमधस्ताच्च भूयोभूयो विचारितम् ॥ ३० ॥
यावन्नास्ति किलोपायश्चित्तोपशमनादृते ।
ऋते तथ्ये तते शुभ्रे बोधे हृद्युदिते सति ॥ ३१ ॥
मनोविलयमात्रेण विश्रान्तिरुपजायते ।
व्यायते हृदयाकाशे चिति चिच्चक्रधारया ॥ ३२ ॥
मनो मारय निःशङ्कं त्वां प्रबध्नन्ति नाधयः ।
यदि रम्यमरम्यत्वे त्वया संविदितं विदा ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
अतः परमात्मा में समूल चित्त का विनाश कर देना ही मुक्ति का उपाय है, अन्य उपाय
नहीं है, ऐसा कहते हुए उपसंहार करते हैं।
अन्यसत्तानिरपेक्षसत्तावाले (जिसकी सत्ता किसी अन्य सत्ता की अपेक्षा नहीं करती) सबके
हितकारी, मायारूपी मलिनता से रहित सब प्रमाणों में सर्वश्रेष्ठ प्रमाणरूप श्रुति द्वारा बोधित
परमात्मा में चिद्भावमात्र से परिशेषरूप चित्त के उपशमन के सिवा मुक्ति का दूसरा उपाय ही
नहीं है। इस बात का ऊपर के स्वर्ग आदि लोको में, नीचे के पाताल आदि लोको में ओर अन्यान्य
द्वीपों में तत्त्वदर्शी विद्वानों ने एक बार नहीं अनेक बार विचार कर निश्चय किया है