Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 111, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 111, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 111 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
नूनं दैवमनादृत्य मूढसंकल्पकल्पितम् ।
पुरुषार्थेन संवित्त्या नय चित्तमचित्तताम् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई शंका करे कि दैव के प्रतिकूल होने पर कैसे कार्य सिद्धि होगी ? इस पर कहते हैं ।
हे रामचन्द्रजी, मूढ़ पुरुषों से संकल्प से कल्पित दैव का अनादर कर पुरुषार्थ रूप
आत्मसंवेदन से अपने चित्त को अचित्त बना दीजिये । यानी संकल्प-विकल्प रहित बना
दीजिये