Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 111, Verses 18–19
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 111, verses 18–19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 111 · श्लोक 18, 19
संस्कृत श्लोक
तां महापदवीमेकां कामप्यधिगतं चिरम् ।
चित्तं चिद्भक्षितं कृत्वा चित्तादपि परो भव ॥ १८ ॥
भव भावनया युक्तो युक्तः परमया धिया ।
धारयात्मानमव्यग्रो ग्रस्तचित्तं ततः परम् ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
अचित्तता की प्राप्ति में कौन उपाय है ? यह पूछने पर उसे कहते है ।
चित्त को बहुत काल तक उस किसी एक महापदवी को (ब्रह्मरूपता को) प्राप्त हुआ बनाकर
पीछे साक्षात्कार वृत्ति से आविर्भूत हुई चिति से मन के साथ अविद्या का बोध होने से चिद् से
भक्षित करके चित्त से भी पर परिपूर्ण चिन्मात्ररूप होओ, यह अर्थ है । पहले आप चिन्मात्रभावना
से युक्त होइए। चिन्मात्रभावना की स्थिरता के लिए अतिसावधान बुद्धि से युक्त होइए। तदनन्तर
चित्त को चित् से ग्रस्त करके किसी प्रकार की व्याकुलता से रहित होकर चित्त से पर आत्मा का
धारण कीजिये