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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 111, Verses 44–45

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 111, verses 44–45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 111 · श्लोक 44

संस्कृत श्लोक

अपि ब्रह्मकुटीलक्षं मनसश्चेत्समीहितम् । तदणोरन्तरे व्यक्तं विभक्तं परिदृश्यते ॥ ४४ ॥ संकल्पमात्रविभवेन कृतात्यनर्थं संकल्पमात्रविभवेन सुसाधितार्थम् । संतोषमात्रविभवेन मनो विजित्य नित्योदितेन जयमेहि निरीप्सितेन ॥ ४५ ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामचन्द्रजी, आप परमात्मपदरूप सिंहासन लगाकर एकमात्र संकल्प के अभाव से सिद्ध होनेवाले, समग्र सिद्धियाँ देनेवाले, असंकल्परूप साम्राज्य में स्थित होडये । जैसे अंगार के विनाश की इच्छा करनेवाले यानी जलते हुए अंगार के विनाश से तापशान्तिरूप सुख को चाहनेवाले पुरुष को काठ को क्रमशः भस्म करता हुआ, अतएव क्षीण होता हुआ अंगार ताप का उपशमन आनन्द देता हे वैसे ही क्षीण हो रहा मन क्रमश: अति उत्तम आनन्द देता है ॥४ २, ४ ३॥ संकल्प की वृद्धि होने पर चिद््‌अणु के मध्य में लाखों ब्रह्माण्डे की कल्पना हो सकती है, ऐसा कहते है । यदि मन संकल्पा द्वारा वासनायुक्त हो, तो अणु के अन्दर भी लाखो ब्रह्माण्ड साफ और अलग-अलग दिखाई दे सकते हैं