Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 111, Verse 3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 111, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 111 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
त्यजन्नभिमतं वस्तु यस्तिष्ठति निरामयः ।
जितमेव मनस्तेन कुदन्त इव दन्तिना ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
अभिमत वस्तु त्याग रूपी पहली भूमिका को दृढ़ बनाना चाहिये, इस अभिप्राय से कहते हैं ।
अभिमत वस्तु का त्याग करता हुआ जो पुरुष राग आदि चित्त की व्याधि से रहित होकर
रहता है, वह मन को इस प्रकार जीत ही चुका जिस प्रकार कि सुन्दर दाँतवाला हाथी खराब
टूटे-फूटे दाँतवाले हाथी को जीत लेता है