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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 111, Verses 5–7

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 111, verses 5–7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 111 · श्लोक 5-7

संस्कृत श्लोक

शास्रसत्सङ्गधीरेण चिन्तातप्तमतापिना । छिन्धि त्वमायसेनायो मनसैव मनो मुने ॥ ५ ॥ अयत्नेन यथा बाल इतश्चेतश्च योज्यते । भावैस्तथैव चेतोन्तः किमिवात्रास्ति दुष्करम् ॥ ६ ॥ सत्कर्मणि समाक्रान्तमुदर्कोदयदायिनि । स्वपौरुषेणैव मनश्चेतनेन नियोजयेत् ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

हे मननशील श्रीरामचन्द्रजी, आप चिन्तारूपी अग्नि में तपाये गये मन रूपी लोहे को शास्त्राभ्यास और सत्संग से धीर तथा सन्तापरहित मन रूपी लोह शस्त्र से काट डालिये । जैसे बालक लाड़- प्यार ओर भय से किसी प्रयत्न के विना इधर-उधर जहाँ चाहो वहाँ लगाया जा सकता हे वैसे ही चित्त भी शम-दम आदि उपायों से जिधर चाहो उधर लगाया जा सकता है, इसलिए चित्त पर विजय प्राप्त करने मेँ कौन सी कठिनाई है ? उत्तरकाल में अभ्युदयरूप फल देनेवाले समाधि के अभ्यासरूप कर्म में लगे हुए मन को पुरुष अपने पुरुषप्रयत्न से ही चिदात्मा के रूप से एकता को प्राप्त कराये