Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 75
चौहत्तरवाँ सर्ग समाप्त पचहत्तरवाँ सर्ग ब्रह्मा के ध्यान में तत्पर होने पर बारह सूर्या की उत्पत्ति तथा सारे संसार को जला रही प्रलयाग्नि का वर्णन ।
51 verse-groups
- Verses 1–2प्रासंगिक प्रश्न को समाप्त कर अब एकमात्र प्रस्तुत आख्यायिका का अनुसन्धान करते हैं / महारा…
- Verse 3इसके बाद आकाश में अग्निरोक के तुल्य तथा सागर में बड़वानल के समान प्रदीप्त हुए एक और सूर्य…
- Verse 4तदनन्तर दक्षिण दिशा में, उसके बाद अग्निकोण में, फिर पूर्वदिशा की ओर, उसके बाद पुनः मैंने…
- Verse 5हे श्रीरामचन्द्रजी, उसके वाद उत्तरदिशा में, वायव्यकोण में तथा पश्चिम दिशा में भिन्न -भिन्…
- Verse 6इतने में व्याकुल होकर ज्यों ही मैं दैव की प्रतिकूलता को विचारने लगा त्यों ही झट भूतल से स…
- Verse 7दिग्गणों के मध्याकाश में ग्यारहवाँ सूर्य उदित हुआ । उस ग्यारहवे सूर्य में, दर्पण में प्रा…
- Verses 8–9हे श्रीरामचन्द्रजी, उस ग्यारहवे सूर्य में वे तीनों सूर्य भगवान् रुद्र के शरीर हैं । उस भ…
- Verses 10–11हे कमलनयन, इसके बाद झट बिना अग्नि के ही अग्निका दाह तथा अदृश्य उल्मुकं के गुल्मक उत्पन्न…
- Verses 12–13और प्रबल हथेली के आघात से मारे जा रहे गेंद की तरह आकाश में जाकर वहाँ स्थित हो मैंने उदित…
- Verse 14हे श्रीरामचन्द्रजी, वहाँ मैने महाकुहकुह शब्दों से युक्त सातों समुद्र को खूब खौलाकर काढ़ा…
- Verse 15उस सूर्यमण्डल ने ज्वालासदृश घन रक्तवस्त्राडम्बरों से सारे पर्वतो को सिन्दुरी रंग का कर दि…
- Verses 16–17चट-चट शब्द करते हुए नगरों के मण्डल को उसने स्फुरित हो रहे कट-कट शब्दों के आडम्बरों से युक…
- Verse 18हे श्रीरामचन्द्रजी, वह बारह आदित्यो का मण्डल, जिसका मैने अवलोकन किया, चारों ओर से समस्त प…
- Verse 19सभी स्थानों में अपने-अपने घरों के भीतर उसके ताप से जल रहा जन-समुदाय इधर-उधर जोरों से भाग…
- Verse 20सारे महानगरों के जलजन्तुओं को, जो उनके उदर में रह रहे थे, सन्तप्त हुए जलों से व्याकुल कर…
- Verse 21हे श्रीरामचन्द्रजी, मैंने बारह आदित्यं का वह समुदाय देखा, जो विदलित हो रहे तथा दग्ध हो चु…
- Verse 22वह जले हुए नगरों के मण्डलो को गिर रहे पर्वतों के द्वारा पीस-पीसकर खूब चूर्णरूप में परिणत…
- Verse 23सन्ताप से सन्तप्त होकर उछलते हुए प्राणियों द्वारा सभी सागरो एवं पर्वतं को वह ऐसा बना रहा…
- Verse 24हे श्रीरामचन्द्रजी, उस समय कुछ लोग जोर-शोर से खूब चिल्लाने तथा रोने से थक गये थे एवं कुछ…
- Verse 25सूखे समुद्रो मे उसके द्वारा लगातार सदा पकते रहने के कारण मगर आदि जल जन्तु परस्पर खूब टक्क…
- Verses 26–29हे श्रीरामचन्द्रजी, इसके अनन्तर प्रलयाग्निरूपी नट जगद्रूपी जीर्णं कुटी में ताण्डव नृत्य क…
- Verses 30–31हे श्रीरामचन्द्रजी, कहीं सुन्दर गर्तो से शोभित, कहीं पर अरघट्टयन्त्रौ से अलंकृत तथा कहीं…
- Verse 32भंभं भकार भयंकर शब्दों से बहुत ज्यादा धूलि फेंकती हुई ये सभी दिशाएँ दुष्ट राक्षसियों की त…
- Verse 33उत्तम गर्तो से युक्त पर्वतभूमियों की गुफाओं से खूब ज्वालाएँ निकलने लगीं । उन ज्वालाओं के…
- Verses 34–36सम्पत्तिरहित उन सब दिशाओं ने तत्काल निकले हुए रक्त के सदृश ज्वालाजालों से, जो सिन्दुरी रं…
- Verses 37–38युवावस्था को प्राप्त दावानल चित्रलिखित कोठों पर की मिथ्या अग्नि को मानों यथार्थं अग्नि बन…
- Verse 39तथा दक्षिण देश में सघनात्मक पर्वत भी ज्वालायुक्त वनों की गर्जनासहित अंगार के समान क्षुब्ध…
- Verse 40बीच-बीच में जिनकी कुछ कालिमा प्रकाशित हो जाती थी ऐसे धूम्ररूपी भ्रमरो से मालित तथा धूम्रस…
- Verse 41ज्वालारूपी चूडामणि से अलंकृत तथा घूम्रों के आवर्त एवं धूमकेतु नामक उत्पातविशेषरूपी केशपाश…
- Verse 42ब्रह्माण्ड का उर्ध्वभाग ही जिसका कपाट है ऐसी पृथिवी अपने अधोभाग में स्थापित अग्नि की ज्वा…
- Verse 43उस प्रलयकाल मेँ अपनी छाती पीट-पीट कर रो रही जगत्-लक्ष्मी के हृदयपर स्थापित हुए हाथ में-अ…
- Verse 44उस समय सभी पर्वत चटचटा शब्दों, सभी वृक्ष कटकट शब्दों तथा सभी देश हलहला शब्दों के साथ अच्छ…
- Verses 45–46इसी तरह सायर भी मुह पीट-पीटकर एक तरह से रोने लय गये, यह उतरा कर्ते हैं । कथित आकारवाले (ज…
- Verse 47कहीं पर सारी दिशाओं तथा सारे आकाश को ग्रास कर जानेवाले या उन्हे पूर्ण कर देनेवाले इन सागर…
- Verse 48हे श्रीरामचन्द्रजी, ओर सुनिये-उस समय प्रलयकालीन मेघो की निवृत्ति से वृष्टिशून्य दसो दिशाए…
- Verse 49समीप के अनेक पर्वतो, इन्द्र, कल्पद्रुम, आगारों तथा गुहागृहों के सहित, सुन्दर आकारवाला सुव…
- Verse 50सम्पूर्ण शीतल अन्तःकरण से युक्त एवं शुद्ध हिमालय पर्वत तो उस प्रलय आग से एक ही क्षण में ल…
- Verse 51हे श्रीरामचन्द्रजी, उस महाभयंकर प्रलयकालीन दशा मेँ भी मलयाचल तो अपने निर्मल सौरभ से युक्त…
- Verse 52महान् पुरुष तो नष्ट होते हुए भी आनन्द प्रदान करते हैं किसी को दुःख नहीं देते, (हे श्रीरा…
- Verse 53उत्तम वस्तु कभी भी अवस्तुता को यानी निकृष्टता को नहीं प्राप्त होती, (देखिये) प्रलयकालीन अ…
- Verse 54जो कस्तु कभी नष्ट नहीं होती वही इस जयत् में सार है, उती की प्रशा करनी चाहिए, इस अभिप्राय…
- Verse 55आकाश तो विभु यानी व्यापक होने से अविनाशी है और सुवर्ण दोषरहित होने से यानी दोषों से निचोड…
- Verse 56मेघरूपी पर्वतों को जलानेवाला महाधूम्र की ज्वालासहित प्रलयाग्निरूपी वारिद (मेघ) इधर-उधर चल…
- Verses 57–58सभी तरह के जलों के बिलकुल सूख जाने के कारण यानी संस्कारमात्र भी अवशेष न रह जाने के कारण स…
- Verse 59जब तक उल्लसित हुई वह प्रलयाग्नि कैलास पर्वत को न लाँघ सकी, इतने में ही कल्पान्त के लिए कु…
- Verse 60उम्र दाह का भी वर्णन करते हैं / दाह से तड़कते हुए वृक्षों के तथा महाशिलाओं के चटचट शब्दों…
- Verse 61और सुनिये-ये सभी पर्वत ज्वालाओं के घनघटाटोपों से मुकुटसहित चंचल अग्र शिखरोंवाले होते हुए…
- Verse 62“कभी तो सृष्टि अवश्य रही ही होगी” इस प्रकार सृष्टि स्मरणीय दशा को प्राप्त हो गई । मूर्खो…
- Verse 63ताप ओर उपताप में परम यानी सबसे बढ़े-चढ़े तथा दूसरों को मारने में तत्पर प्रलयकाल के पवनं न…
- Verse 64प्रकाशमान अग्नि के उल्मुकं से संयुक्त होने के कारण गुल्ममण्डलों (५) के सदृश शोभायमान प्रल…
- Verse 65चंचल ज्वालाओं से तड़कते हुए अग्निमय वृक्षों के वनों में उत्पन्न भस्म सहित उष्णता से आकाश…