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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 75, Verses 45–46

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 75, verses 45–46 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 75 · श्लोक 45,46

संस्कृत श्लोक

देशा हलहलोल्लासैरलं विदलनं ययुः । अब्धयः क्वथिताकाराः फेनिलोल्लासमांसलाः ॥ ४५ ॥ वीचीकरतलाघातांश्चक्रुरर्कमुखे मुखे । अन्योन्यवेल्लितोल्लोलभूतलाकारपर्वतम् ॥ ४६ ॥

हिन्दी अर्थ

इसी तरह सायर भी मुह पीट-पीटकर एक तरह से रोने लय गये, यह उतरा कर्ते हैं । कथित आकारवाले (जिनके जल खूब खौल गये थे ऐसे) तथा फेनिल होने के कारण उन फेनों के उल्लास से परिपुष्ट हुए सारे समुद्र स्वीय जल में पड़े सूर्य प्रतिबिम्बरूप तिलक से समन्वित अपने मुख में तरंगरूपी करतलं से आघात पहुँचाते हुए रोने लग गये तथा पुनः वे सबके आपस में सम्बद्ध होकर तरगों के आघात से मिट्टी तथा पत्थर आदि को बिल्कुल बराबर कर देने के कारण भूतलरूपता को प्राप्त हुए पर्वत का तरंगरूपी अपने हाथों से ऐसे ग्रास करने लग गये, जैसे कि मूर्ख प्राणी देह में प्राप्त मिट्टी तथा पत्थर आदि को प्राप्त करने लग जाते हैं