Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 75, Verse 18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 75, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 75 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
भूतलोकपुरापातस्फुटच्चटचटोद्भटम् ।
ताराविशरणोद्धातघृष्टरत्नधरातलम् ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, वह बारह आदित्यो का मण्डल, जिसका मैने
अवलोकन किया, चारों ओर से समस्त प्राणियों के लोकों एवं उनके अंतर्गत नगरों के पतन से फट
(५) दसों दिशाओं के बीच में उदित हुए सूर्य के अन्दर उदित तीन सूर्यस्वरूप एक ही ब्रह्मा,
विष्णु ओर शिवात्मक रुद्र का यह एक रौद्र शरीर है । वही “तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गः" इस गायत्री से
प्रकाशित होता है । एकमात्र यही कारण है कि वह चौबीस अक्षरों से प्रसूत चौबीस हजार श्लोकों
के पूर्वरामायण के सारसंग्रह स्वरूप आदित्यहृदय में ब्रह्मेशानाच्युतेशाय रौद्राय वपुषे नमः" इस
श्लोक से तीन मूर्तियों के मूलभूत परमशिव के रूप से नमस्कृत हुआ है, सभी विद्धान् लोग उसी
को सर्वोत्कृष्ट उपास्य देव कहते हैं, यह एक ज्ञातव्य विषय है।
रहे पदार्थो के चटचटाशब्दों से उद्भूत-प्रचण्ड था । अश्विनी आदि तारा समूहों के पतन के
अभिघातं से धरातल के रत्नों को वह धिस रहा था