Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 75, Verses 16–17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 75, verses 16–17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 75 · श्लोक 16,17
संस्कृत श्लोक
स्फुरत्कटकटाटोपचटत्पत्तनमण्डलम् ।
विदधद्भूतलोद्भूतधूमदण्डैः शिलाघनैः ॥ १६ ॥
काचस्तम्भसहस्राढ्यं भुवनस्थानमण्डपम् ।
क्वथद्भूतमहाभूतताराक्रन्दातिघर्घरम् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
चट-चट शब्द करते हुए नगरों के मण्डल को उसने स्फुरित हो रहे कट-कट शब्दों
के आडम्बरों से युक्त कर दिया था । शिला के समान घनीभूत, भूतलपर उद्भूत हुए दण्डाकार
धूम्रं से भुवनस्थानमण्डल को हजारों काच के खम्भों से वह परिपूर्ण बना रहा था । काढारूप में
परिणत हो रहे समस्त प्राणियों तथा पृथिवी आदि महाभूतं के ऊँचे आक्रन्दन से उसमें अतिघर्घर
शब्द हो रहा था