Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 75, Verse 55
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 75, verse 55 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 75 · श्लोक 55
संस्कृत श्लोक
तयोरेव वपुः श्लाघ्यं सर्वनाशेऽप्यनाशयोः ।
नभो विभुतयाऽनाशि हेमाकृष्टतयाक्षयम् ॥ ५५ ॥
हिन्दी अर्थ
आकाश तो विभु
यानी व्यापक होने से अविनाशी है और सुवर्ण दोषरहित होने से यानी दोषों से निचोड़कर शोधितरूप
होने से अक्षय हे । इसलिए हे श्रीरामजी, रज और तमसे निचोड़कर निकाले गये यानी जिसमें ओर
तम बिल्कुल नहीं है ऐसे शुद्ध एक सत्त्वको ही ब्रह्मसुख की अभिव्यक्ति होने से मैं सब सुखों का सार
समझता हूँ । मैं रज अथवा तमको सुखों का सार नहीं समझता