Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 75, Verses 30–31

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 75, verses 30–31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 75 · श्लोक 30,31

संस्कृत श्लोक

श्वभ्ररूपारघट्टाट्टपट्टनोदारदिक्तटः । श्रृङ्गाणि सिद्धवृन्दानि गिरयः सागरार्णवाः ॥ ३० ॥ सरः सरस्यः सरितो देवासुरनरोरगाः । आशाः शनशनाशब्दैः पुरुषैश्च शिवार्चिषाम् ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामचन्द्रजी, कहीं सुन्दर गर्तो से शोभित, कहीं पर अरघट्टयन्त्रौ से अलंकृत तथा कहीं ऊँची अट्टालिकाओं से युक्त अनेक नगरों से रमणीय दिशाओं का तट, पर्वतो के शिखर, उन शिखरो पर वास करनेवाले सिद्धो के समूह, उन सिद्ध समूहों से युक्त अनेक पर्वत, सागर, महासागर, तालाब, तलैया, नदी, देव, असुर, नर, उरग (सर्प) ओर पुरुषों के साथ सभी दिशाएँ-ये सबके सब भगवान्‌ रुद्र के नेत्रो की ज्वालाओं के शनशना शब्दों से जलने लगे