Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 75, Verse 52
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 75, verse 52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 75 · श्लोक 52
संस्कृत श्लोक
आसीत्त्यजत्युदारात्मा न नाशेऽप्युत्तमं गुणम् ।
नश्यन्नपि महान् ह्लादं न खेदं संप्रयच्छति ॥ ५२ ॥
हिन्दी अर्थ
महान् पुरुष तो नष्ट होते हुए भी आनन्द प्रदान करते हैं
किसी को दुःख नहीं देते, (हे श्रीरामचन्द्रजी, देखिये न) स्वयं दग्ध होने पर भी वह चन्दन जीवन
धारण कर रहे प्राणियों के आनन्द के लिए ही ज्यो -का- त्यों स्थित रहा