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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 75, Verse 65

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 75, verse 65 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 75 · श्लोक 65

संस्कृत श्लोक

व्यालोलस्फुटदानलद्रुमवनप्रोद्भूतभस्मोष्मणा दत्ताभ्राभ्रमदुल्मुकाहतिवहत्साङ्गारगौरार्चिषः । भ्रश्यत्पावकशृङ्गमध्यविलसज्ज्वालावलीश्यामला निःशेषाग्निनिकाशसुस्तवजवा वेगेन वाता ववुः ॥ ६५ ॥

हिन्दी अर्थ

चंचल ज्वालाओं से तड़कते हुए अग्निमय वृक्षों के वनों में उत्पन्न भस्म सहित उष्णता से आकाश को व्याप्त करनेवाले (<), भ्रमण करते हुए उल्मुकों के अभिघात से निकल रही अंगारसहित पीली ज्वालाओं से युक्त, कज्जलरूप से गिर रही तथा पावक की श्रृंगप्राय शिखा के मध्य में विलास करती हुई कज्जलयुक्त ज्वालाओं की पंक्तियों से श्यामवर्णं एवं सम्पूर्ण जगत्‌ में अग्नियों को प्रकाशित करने से स्तुतियोग्य वेगवाले पवन बड़े वेग से बहने लगे