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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 73

53 verse-groups

  1. Verses 1–2श्रीरामजी ने कहा : हे पूज्यवर, बन्धबुद्धि, मोक्षबुद्धि और जगद्बुद्धि न तो शुन्य है ओर न स…
  2. Verse 3हे प्रभो, सृष्टि आदि के परिज्ञान तथा शून्यता आदि के परिज्ञान न तो कोई सत्य हैं और न कोई अ…
  3. Verse 4मायाशबल (युक्त) ब्रह्म की महिमा के स्रद्ृश मैने माया के अधिष्ठानभूत निर्विशेष, नित्ययुक्त…
  4. Verses 5–7महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, यह जो कुछ स्थावर-जंगमरूप, नाना प्रकार के धर्मों से पूर्ण ए…
  5. Verse 8भद्र, जैसे सरसों की अपेक्षा विशाल आकारवाला सुमेरु पर्वत अति स्थूल है, वैसे ही अन्य की अपे…
  6. Verse 9पर्वतराज सुमेरु की अपेक्षा ये त्रसरेणु जैसे सूक्ष्म हैं, वैसे ही अन्य की अपेक्षा अतिस्थूल…
  7. Verses 10–11कालमान को बतलानेवाली सूर्यस्पन्दन आदि उपाधियों का विनाश हो जाने के कारण प्रलयकाल मानकलना…
  8. Verse 12वह परमाणुरूपता असत्य ही है, फिर भी उसकी अपने अन्दर स्वप्न के समान पहले भावना करता है, फिर…
  9. Verse 13अपने ब्रह्मशन्दार्थ की जो भावना करता है, उसमे कारण उसकी चित्स्वभावता ही है, यह कहते हैं /…
  10. Verse 14एक वतु में विरुद्ध द्ृश्य-द्रष्टा के धर्म नहीं हो सकते, यदि यह शंका हो, तो इसका समाधान यह…
  11. Verse 15ऐसी कल्पना करने पर भी वास्तव में ऐक्य की क्षाति नहीं होती, यह कहते हैं / तदन्तर यह चिदाका…
  12. Verse 16यद्यपि यह चितिरूप आकाश शून्यरूप है यानी आकार से एकदम ही रहित है, फिर भी अपनी अणुरूप तनुता…
  13. Verse 17यह द्रष्टारूप आत्मा माया के बल से अपने को प्रकाशस्वभाव उक्त परमाणु रूप (परिच्छिन्नस्वरूप)…
  14. Verse 18उसी समय यद्यपि उसमे आवश्यक देश, काल आदि के विभायों की कल्पना भी हो जाती है / परन्तु काग्‌…
  15. Verse 19उसकी जो विभागकल्यना हुई; उसमें प्रकार बतलाते हैं / जहाँ यह चितिरूप अणु प्रतीत हुआ, वहाँ द…
  16. Verse 20उसी समय तिपुटी का विभाग करनेवाली उपाधियों की, साक्षी की एवं उसके प्रकाश में हेतुभ्रूत पदा…
  17. Verse 21इसी तरह कर्ता: कार्य. कारण, भोक्ता; भोग्य आवित्िपुटी-विशेष, उनके साक्षी और,निमित्तों की भ…
  18. Verse 22अब इसमें रुपावित्रिपुटी के सिद्ध हो जाने पर वश्च आदि करणों के विभाग की भी कल्पना अगत्या त…
  19. Verse 23श्रोत्र (कान) आदि जो पोच इन्द्रियाँ हैं; उन्हीं के विषयों मे नामरूप भेद कल्पना के पहले की…
  20. Verse 24उस क्रम से चितिरूप अणुका प्रतिभारूप जो आकाश है, वही घनस्थिति होकर स्थूल देहरूप बन जाता है…
  21. Verse 25अब चार अन्त:करणों की कल्पना का प्रकार दिखलाते हैं / इस तरह अणुरूप चिति का ज्ञान दृश्य पदा…
  22. Verse 26तदनन्तर संकल्पविकल्प दशा में वह मन बन जाता है, अभिमान से-अहंभाव एवं ममभाव से - अभिमानी हो…
  23. Verse 27काल और देश में पूर्ववत्‌ जो कल्पना होती है, वह उत्ततकाल की कल्पना को लेकर ही प्रवृत्त होत…
  24. Verse 28वही चितिरूप जीव दूसरे देश-काल में ज्ञान होने पर उनका “उर्ध्व नाम रख लेगा, इसी प्रकार दिशा…
  25. Verse 29इस तरह देश, काल और वर्चुओं की एवं उनके नामो की कल्पना बतलाई गु अब जिन्हे शब्दशकित का ज्ञा…
  26. Verse 30इसी रीति से अपने ही संकल्प के प्रभाव से यह आकाश के सदृश निर्मलरूप धारण करनेवाला चिदाकाश अ…
  27. Verse 31यों समस्त जग्रत्‌ केवल मानिक कल्यनास्वरूय होने के कारण आतिवाहिक शरीर का अवयव ही चिद्ध होत…
  28. Verse 32निर्मल चिदाकाश ने चिदाकाश में ही अपने असत्संकल्प से उक्त प्रकार के विभ्रम की रचना की है,…
  29. Verses 33–35वह गगनरूप चिदणु-जब अपनी देह की कल्पना करनी होती है, तब इस तरह की कल्पना करता है-कहीं कोई…
  30. Verse 36तदनन्तर वह चिदणु अपनी कल्पना से ही कल्पित अपने हाथ, पैर आदि से युक्त तथा चित्त आदि की कल्…
  31. Verse 37जब ईश्वरो की देहो की भी कल्पना उसके सकल्य से होती हैं, तव फिर दूसरों की तो बात ही क्या, य…
  32. Verse 38सभी तरह की यह कल्पना विथ्या ही हैं, यह कहते हैं / वास्तव में तो यह कुछ बना नहीं है, किन्त…
  33. Verse 39व्यष्टियों के सदर स्रमष्टिरुप हिरण्यगर्भ श्री उसी तरह अपनी कल्पना से ही बना है, यह कहते ह…
  34. Verse 40सब कार्यों का कारण, काल, क्रिया आदि का नियामक, सबका आदिभूत हिरण्यगर्भ भी अपनी इच्छा से वह…
  35. Verse 41न तो इसका भौतिक शरीर है और न इसके शरीर में हड्डियाँ ही हैं, अतः इसे कोई मुट्ठी से नहीं पक…
  36. Verse 42जैसे स्वप्न में मेघ, संग्राम और सिंहों की भीषण गर्जना से युक्तस्वरूप रहने पर भी सुप्त पुर…
  37. Verse 43जैसे स्वप्न में देखे गये योद्धाओं के कोलाहल का ज्ञान जाग्रत्‌अवस्था में स्मृतिपथ में आया…
  38. Verse 44एकमात्र माया से उन हजारो वस्तुओं की, जिनकी हम क्षी संभावना नहीं कर सकते, इस संसार में उत्…
  39. Verse 45सात महाकुल पर्वतों तथा गणों के समूहों का आश्रय एवं ब्रह्माण्डों का समूहमय होकर भी ब्रह्मद…
  40. Verse 46सैकड़ों करोड़ लम्बे जगत्‌ के विस्तार से विस्तृत आकारवान्‌ होते हुए भी ब्रह्मदेव अणुमात्रस…
  41. Verse 47यही ब्रह्माण्डात्मा स्वयंभू कहे गये हैं तथा जगत्‌-शरीर विराट्‌ भी यही कहे जाते हैं । लेकि…
  42. Verse 48सनातन पुरुष भी यही कहे गये हैं, इन्हीं की रुद्र संज्ञा पडी है तथा हे श्रीरामचन्द्रजी, इन्…
  43. Verse 49अब पूर्वोक्‍्त को संक्षिप्त कर कहते हैं / हे श्रीरामचन्द्रजी, परम सूक्ष्म चिति पहले सबको…
  44. Verse 50स्पन्द की संवित्‌ से वे स्पन्द का अनुभव करते हैं । उनके जो प्राण हैं उन्हीकी संज्ञा पवन प…
  45. Verse 51स्पंद की प्रवित्‌ से वे स्पंद का अनुभव करते हैं; यह जो ऊपर कहा यया है उसका स्रवनिभव अप्रि…
  46. Verse 52विराट्‌ ने अपने चित्त से जिनकी कल्पना की वे ही ये तेज के कण, चालक द्वारा अपने चित्त से कल…
  47. Verse 53उसके उदर में जनित जो प्राण तथा अपान के आवर्तरूपी झूला है, वही उसकी उदरता वातस्कन्ध संज्ञा…
  48. Verse 54जगत्‌ के अन्दर कल्पपर्यन्त व्यवहार करनेवाले समस्त जीवों में प्रत्येक जीव भेद की इच्छा से…
  49. Verse 55इनसे उत्पन्न प्रत्येक जीव की इच्छा से प्रकटित हुए जो जगद्रूप से अनेक देह हैं उनके कभी बाह…
  50. Verse 56जैसे आद्य बीज हिरण्यगर्भ की इच्छारूप चिति पहले ही उत्पन्न हो गई, वैसे ही आज भी उसकी इच्छि…
  51. Verse 57चन्द्र, सूर्य और पवन - ये तीनों उस हिरण्यगर्भ के कफ, पित्त और वायुरूप हैं और दूसरे जो ग्र…
  52. Verse 58के कारण हम लोग नहीं देख पाते
  53. Verse 59हे श्रीरामचन्द्रजी, इस संसार को आप विराट्‌ पुरुष का शरीर समझिये । वह भी कल्पनात्मक उस विर…