Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 73, Verse 3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 73, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 73 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
सर्गादिसंभ्रमदृशः श्स्वयतादिदृशस्तथा ।
न काश्चन विभो सत्या असत्याश्च न काश्चन ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
हे प्रभो, सृष्टि आदि के परिज्ञान तथा शून्यता आदि के परिज्ञान न तो कोई सत्य हैं और न
कोई असत्य ही है यानी न उनके विषय अबाधित है और न बाधित ही है, क्योंकि तत्-तत्
व्यवहार करनेवाले पुरुषों की दृष्टि से ब्रह्म ही उस तरह से स्थित रहता है । उनकी अर्थक्रिया
के विषय में भी किसी को विवाद नहीं है । असत् कार्यपक्ष माना नहीं जा सकता, सर्वशक्तिमान्
ब्रह्म में सर्वशून्यता बनाने की शक्ति भी हो सकती है तथा माया से सब तरह के विरोधों का
परिमार्जन भी हो सकता है