Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 73, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 73, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 73 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
चिदणोरस्य भावस्य प्रत्यग्रं यत्र वेदनम् ।
स तत्रोत्तरकालेन पूर्वाभिख्यां करिष्यति ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
काल और देश में पूर्ववत् जो कल्पना होती है, वह उत्ततकाल की कल्पना को लेकर ही प्रवृत्त
होती है, यह कहते हैं ।
इन प्रसिद्ध शब्द आदि विषयों का जिस देश या कालरूप आधार में जो सर्वप्रथम विज्ञान होता
है यानी जिस चिदणुरूप जीव को जिस देश या कालरूप आधार में शब्दादि विषयों का विज्ञान
होता है, वही जीव देश या कालरूप आधार का उत्तरकाल से भिन्न पूर्वदेश या पूर्वकाल-यों
नामकरण कर देगा, यही नियम प्रत्येक वस्तु और प्रत्येक जीव के लिए लागू है