Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 73, Verse 44
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 73, verse 44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 73 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
बहुयोजनलक्षौघप्रमाणोऽपि बृहद्वपुः ।
परमाण्वन्तरे भाति लोमान्तस्थजगत्र्त्रयः ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
एकमात्र माया से उन हजारो वस्तुओं की, जिनकी हम क्षी संभावना नहीं कर सकते, इस
संसार में उत्पत्ति दीखती है, यह कहते हैं /
अनेक लाखों योजन के समूहों तक विशाल प्रमाणवाला, बृहत-शरीर भी यह त्रैलोक्य रोम के
सूक्ष्म भाग के अन्त में स्थित सिर्फ एकमात्र माया से ही परमाणु के अन्दर भी भासता है