Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 73, Verse 37
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 73, verse 37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 73 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
एवं संपद्यते ब्रह्मा तथा संपद्यते हरिः ।
एवं संपद्यते रुद्र एवं संपद्यते कृमिः ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
जब ईश्वरो की देहो की भी कल्पना उसके सकल्य से होती हैं, तव फिर दूसरों की तो बात ही
क्या, यह कहते हैं /
इसी तरह अपनी ही कल्पना से चिदणु - जीव ब्रह्मा बन जाता है, नारायण बन जाता है, रुद्र
बन जाता है तथा कीट भी बन जाता है