Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 73, Verse 21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 73, verse 21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 73 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
एवमुच्छूनता भाति मितानन्ताथ वा क्रमात् ।
असत्यैव नभस्येव नभोरूपैव निष्क्रमा ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
इसी तरह कर्ता: कार्य. कारण, भोक्ता; भोग्य आवित्िपुटी-विशेष, उनके साक्षी और,निमित्तों
की भी कल्पना सर्वत्र जान लेनी चाहिये, इसे कहते हैं /
इसी तरह उसकी विपुलता दिखाई पड़ती है, असीमरूपता या संख्या से इयत्ता (सीमा)
भी क्रम से उसमें देशादि परिच्छेदों से जानी जाती है । वास्तव में तो विपुलता या असीमता
आदि असत्यरूप ही है । उसमें कोई क्रम नहीं है तथापि इसे आकाश में आकाशरूपता के
सदृश जान लेना चाहिए