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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 73, Verses 1–2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 73, verses 1–2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 73 · श्लोक 1,2

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । बन्धमोक्षजगद्बुद्धिर्न शून्या नापि सन्मयी । नास्तमेति न चोदेति किमप्याद्यमसौ किल ॥ १ ॥ उपदिष्टमिदं ब्रह्मंस्त्वया बुद्धमलं मया । भूयः कथय तृप्तिर्हि श्रृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीरामजी ने कहा : हे पूज्यवर, बन्धबुद्धि, मोक्षबुद्धि और जगद्बुद्धि न तो शुन्य है ओर न सन्मय ही है यानी न सत्य अर्थवाली ही है जिसका अस्त नहीं होता और जिसका उदय भी नहीं होता , ऐसा कोई भी यह आद्य पदार्थ है यह मैंने जाना जो आद्य पदार्थ है, वह सबका साक्षी है, अतः उसका न तो उदय हो सकता है और न अस्त ही हो सकता है. इसलिए यह सर्वसाक्षीरूपा बुद्धि ही विषयों का परिमार्जन करने पर कोई भी वाणी एवं मन से अगम्य आद्य (ब्रह्म) है, यही आपने तात्पर्यवृत्ति से उपदेश दिया है और यह मैंने अच्छी तरह समझ भी लिया है (तब कया अब उपदेश विरत हो जाऊँ 2 नहीं यह कहते हैं) भगवन्‌, इस विषय में आप फिर मुझको उपदेश दीजिये, क्योकि अमृत सुन रहे मुझे तृप्ति नहीं हो रही है