Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 73, Verses 10–11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 73, verses 10–11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 73 · श्लोक 10,11
संस्कृत श्लोक
अमानकलिते सौम्ये काले परिणते चिरम् ।
शान्ते तस्मिन्परे व्योमन्याद्ये ह्यनुभवात्मनि ॥ १० ॥
असंकल्पो महाशान्तो दिक्कालैरमिताकृतिः ।
अन्तर्महांश्चिदाकाशो वेत्तीव परमाणुताम् ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
कालमान को बतलानेवाली सूर्यस्पन्दन आदि उपाधियों का विनाश
हो जाने के कारण प्रलयकाल मानकलना से रहित हो जाता है, इस तरह का प्रलयकाल ब्रह्माजी
की जो दो परार्धं आयु निश्चित है, उसीके समान उतने समय तक रहता है । इतने लम्बे समय तक
प्रलय रहकर जब चला जाता है, तब साक्षीरूप परमशान्त, सबके आदि उस महा चिदाकाश में
मायारूप आवरण से युक्त, भीतर सुषुप्त-प्राय चिदाकाश स्वप्नोन्मुख के सदृश अपने भीतर
परमाणुरूपता का (अपने भीतर विलीन जगत्संस्काररूप परमाणुरूपता का) मानों अनुभव करता
है अर्थात् पर्यालोचन करता है । असल में यह तो संकल्पशून्य, महाशान्त है । इसकी आकृति दिशा
एवं काल आदि से नापी नहीं जा सकती