Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 71
सत्तरवाँ सर्ग समाप्त इकहत्तरवों सर्ग॑ कल्पना के कारणभूत ब्रह्माजी के संकल्प का ज्यों -ज्यों विनाश होता गया, त्यो -त्योँ उनके कल्पित समस्त पदार्थों का प्रलय भी हो गया, यह वर्णन |
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- Verse 1महाराज वसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामभद्र, ऐसा मुझसे कहकर भगवान् ब्रह्माजी, ब्रह्मलोक में रहन…
- Verse 2भद्र, ओंकार की उत्तरार्धभूत जो आधी मात्रा है, उसमें विद्यमान नाद, बिन्दु आदि भागों में क्…
- Verse 3यह विद्याधरी भी ब्रह्माजी का अनुसरणकर ध्यानमग्न हो गई और फिर स्मरणहेतु समस्त बीजभूत संस्क…
- Verse 4यह उनका भीतरी रहस्य आपने कैसे जाना, इस प्रश्न पर कहते हैं / श्रीरामजी, स्थूल, सूक्ष्म कार…
- Verses 5–6ब्रह्माजी का संकल्प धीरे-धीरे ज्यों-ज्यों उस क्षण से लेकर नीरस होता गया, त्यों- त्यों तत्…
- Verses 7–8अंग है, इसलिए जब विराट् आत्मा के संवेदन का उपसंहार हो गया, तब पृथ्वी अचेतन तथा नीरस होकर…
- Verse 9आथयस्थ दुष्टान्त को प्रकट करते हैं / जैसे हम लोगों के अंग संवेदना के उपसंहार में नीरस हो…
- Verse 10किस-किस प्रकार से पृथ्वी जर्जर हुई; इसे बतलाते है / पहले तो वह पृथ्वी एक साथ अनेक बड़े-बड…
- Verse 11आकाश के अकाण्डताण्डव, राजाओं एवं चोरों के उपद्रवो से जनित दीनता तथा दरिद्रता से उसका सारा…
- Verse 12उस समय उस पृथ्वी में धूलि के सदृश मन्द नीहार एलं धूलि से सूर्य भी धुंधला हो गया । शीत-उष्…
- Verse 13उसमें अग्निदाह, जल के पुर एवं युद्धो से मण्डल के मण्डल छिन्न-भिन्न हो गये । तथा वह अतिवृष…
- Verse 14अशंकित महान् उत्पातां से उस समय वहाँ पर्वत, नगर अपने- आप गिरने लगे, बच्चों के, श्रोत्रिय…
- Verse 15जल की दुर्लभता के कारण स्थलियों के बीच में निःशंक वहाँ जहाँ तहोँ अगाध कूप लोगो ने खन दिये…
- Verse 16भद्र, उस समय वहाँ सम्पूर्ण मनुष्य धान आदि के क्रय -विक्रय आदि व्यवहार से ही अपना निर्वाह…
- Verse 17जनों के आचरण दुःखरूप शूलरोग से आक्रान्त हो गये, समस्त प्रजा शीत-उष्ण आदि द्रनदरों से आक्र…
- Verse 18सारी पृथ्वी अधर्मरूपी शूलरोग से त्रस्त जनों से चारों ओर व्याप्त तथा सैकड़ों कुशास्त्रों स…
- Verse 19उस समय अनार्य ही समस्त पृथ्वी के रक्षक बन गये, पण्डितगण अनार्यो द्वारा विताडित होने लगे,…
- Verse 20श्रीरामजी, क्या कहा जाय, सारी पृथ्वी परधर्म मे प्रवृत्त पुरुषों से व्याप्त हो गई, उसमें ध…
- Verse 21नगर, गाँव तथा देवता और ब्राह्मणों के मन्दिरों को दस्युओं ने छिन्न-भिन्न कर दिया एवं अन्या…
- Verse 22आलस्यदोष से सब धार्मिक पुरुषों ने अपना-अपना नियमित सन्ध्यावन्दन आदि कार्य छोड दिया । परिण…
- Verse 23नगर ओर गाँव केवल भस्मावशेष रह गये, सम्पूर्णं मण्डल (जिले) उजड़ गये ओर शब्द करनेवाले भस्म…
- Verse 24सारी पृथ्वी का पेट अभागी प्रजाओं के बड़े-बड़े समारोह एवं रोने के शब्द से युक्त बन गया, सा…
- Verses 25–26भद्र, उस समय पृथ्वी मे ऋतुओं ने अपना-अपना गुण- स्वभाव छोड़ दिया ओर उसके सभी प्रदेशों की स…
- Verse 27जब जलधातु का स्वरूप कुपित हो गया, तब उसने भी अपना नियम तोड़ दिया और नियम तोडने के कारण सम…
- Verse 28फिर उन्मत्तो के सदुश शब्द कर रहे समुद्र विकृतभाव धारण करने लग गये ओर अपनी बड़ी-बड़ी तरंगो…
- Verse 29समुद्रो मे बड़ी-बड़ी उन्नत तरंगे उठने लग गयीं, मत्त ओर भयंकर महान आवर्त भी होने लगे-इससे…
- Verses 30–31बड़े- बड़े गुड-गुड शब्द करनेवाले आवर्तो द्वारा किये गये महान् गर्जन से उनकी पर्वत-कन्दरा…
- Verse 32सभी समुद्रो का भीतरी भाग अपना-अपना उत्तम वेग बतलाकर दूसरों पर विजय पाने के निमित्त आगे-आग…
- Verse 33समुद्रों से उछले हुए मगरो ने आकाशगामी जीवों और बड़े-बड़े मेघमण्डलों को आच्छादित कर दिया ओ…
- Verse 34ऊँचे हाथियों के सदृश तथा अतिचपल मगरो के फूत्कार से सूर्य का मण्डल भी धुल जाने लगा ओर परस्…
- Verse 35समुद्रो ने अपनी विशाल तरंगो से तीरस्थ पर्वतं को चूर्णित कर दिया, गर्जना करते हुए पर्वतां…
- Verse 36सम्पूर्ण समूद्रों की गतियाँ कुछ विचित्र ही हो गई, वे शत्रुओं के नगरों पर आक्रमण करनेवाले…
- Verse 37पहले तो इन्होंने वनसमूहों को उखाड़ फेंका, फिर उनको ऊपर उठाया, इससे आकाशमण्डल ऐसा प्रतीत ह…
- Verse 38भयंकर शब्द करनेवाले प्रचण्ड वायुओं ने तरंगो को विभक्त कर देने के कारण पर्वतां के सदृश समस…
- Verses 39–40उल्लासयुक्त अनेक बड़े-बड़े आवर्तो के द्वारा समुद्र मगर आदि जलचरों को ऊपर की ओर फेंक रहे थ…
- Verse 41समुद्रों ने बड़ी-बड़ी गुफाओं का विदलन कर दिया था, इससे उनमें से निकले हुए स्फटिक आदि पत्थ…
- Verse 42उस समय उनमें गिर रहे पर्वततटों के कटकट शब्द सुनाई पड़ने लगे। तथा उनमें बड़े-बड़े मत्स्यो…
- Verse 43लीला से काटे गये अरण्यसमूहों में समुद्रों की कहीं तो शीतल जलधाराएँ बहने लगीं और कहीं जल र…
- Verse 44भद्र, सभी समुद्रों में एक अजीब-सा दृश्य उपस्थित हो गया, समुद्रजल से अपने आश्रयभूत इन्धनों…
- Verse 45अपने जलां के द्वारा पर्वतों को एक-दूसरे पर्वतो के साथ टकरा देने में समुद्र बड़ ही कुशल हो…
- Verse 46समुद्रो मेँ कोई अनोखी ही शोभा उस समय मालूम होने लगी थी, उनमें बड़े-बड़े पर्वत, वनों के सम…
- Verse 47असुरो से पातालों के सदृश सारे समुद्र प्रलयकारी तरगों से व्याकुल हो उठे-यों सागरो के विक्ष…
- Verse 48वह ध्वनि विलक्षण भी, पातालतलरूप तालु के भीतर विदारण हो जाने से वह ध्वनि मिलकर जोर पकड़ रह…
- Verse 49इसके बाद प्रलयकारी मेघो के शब्दों से विलक्षण आडम्बरों से युक्त होकर अन्तरिक्ष मानों गिरने…
- Verse 50आकाशमण्डल से आवर्तौ की गोलाई के सदृश वर्तुलाकार उत्पातजनक धूमकेतु गिरने लगे, उनका वर्णं स…
- Verse 51दिशातटों को दग्ध कर देनेवाली तथा चंचल ज्वालारूप जटाओं के आरोप से युक्त अनेक प्रकार की उत्…
- Verse 52भद्र, मैंने पहले जिन ब्रह्माजी का वर्णन किया है, उन्होने जब अपना विधारणसंकल्प समेट लिया,…
- Verse 53चन्दर, सूर्य, वायु, इन्द्र, अग्नि एवं यम-ये सब बड़े कोलाहल से ग्रस्त हो गये, उनका अधिकार…
- Verse 54भू-कम्पनों से कटकट शब्द के साथ वृक्षों के समूह गिरने लगे ओर अनेक तरह के झूलों के सदृश आन्…
- Verse 55भूकम्प के कारण कैलास, सुमेरु ओर मन्दर की कन्दरा ओं में भारी चंचलता पैदा हो गई ओर कल्पतरु…
- Verse 56हे श्रीरामजी, लोकान्तर पर्वत, नगर, समुद्र, अरण्य-यह जगत् पूर्ण समुद्र मेँ उत्पातयुक्त कल…