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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 71, Verse 56

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 71, verse 56 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 71 · श्लोक 56

संस्कृत श्लोक

लोकान्तराद्रिपुरवारिधिकाननान्तमुत्पातकल्पपवनेन मिथो हतानाम् । कोलाहलैर्जगदभूत्प्रविकीर्णशीर्णं पूर्णार्णवे त्रिपुरपूर इवाभिपाती ॥ ५६ ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामजी, लोकान्तर पर्वत, नगर, समुद्र, अरण्य-यह जगत्‌ पूर्ण समुद्र मेँ उत्पातयुक्त कल्पपवन के बहने से एक दूसरे से टक्कर खा रहे मनुष्यों के कोलाहल से शीर्ण-विशीर्ण हो गया, जैसे रुद्रबाण की अग्नि के दाह से चारों ओर से गिर रहा त्रिपुरनगर (दैत्यसमूह) छिन्न -भिन्न हो गया था