Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 71, Verse 18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 71, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 71 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
अधर्मशूलवलिता कुशास्त्रशतशूलिनी ।
दुर्जनाखिलवित्ताढ्या विपद्विहतसज्जना ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
सारी पृथ्वी अधर्मरूपी शूलरोग से त्रस्त जनों से चारों
ओर व्याप्त तथा सैकड़ों कुशास्त्रों से यानी वेदबाह्य विचारों से रोगपीडित होकर क्रन्दन करने लग
गई । उस समय वहाँ चोर आदि दुर्जन ही धनों से पूर्ण हो गये और सज्जन अनेकविध विपत्तियों से
धिर गये