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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 71, Verse 10

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 71, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 71 · श्लोक 10

संस्कृत श्लोक

संपन्ना संहतानेकमहोत्पातभरावृता । दुष्कृताङ्गारनिर्दग्धनरकोन्मुखमानवा ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

किस-किस प्रकार से पृथ्वी जर्जर हुई; इसे बतलाते है / पहले तो वह पृथ्वी एक साथ अनेक बड़े-बड़े उत्पातां के भार से आक्रान्त हो गई, फिर उसमें पापरूपी अंगारों से परितप्त नरकों की ओर प्रवृत्तिशील मनुष्य होने लगे