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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 71, Verse 4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 71, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 71 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

परमेष्ठिन्यसंकल्पे तस्मिंस्तानवमेयुषि । सर्वगानन्तचिद्व्योमरूपोऽपश्यमहं यदा ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

यह उनका भीतरी रहस्य आपने कैसे जाना, इस प्रश्न पर कहते हैं / श्रीरामजी, स्थूल, सूक्ष्म कारणरूप अर्थो के साथ प्रणव की मात्राओं के विलय क्रम से वासना- संकल्पशून्य होकर जब ब्रह्माजी उत्तरोत्तर सूक्ष्मभाव को प्राप्त होने लगे, तब मैं भी समाधि से सर्वत्र व्यापक असीम चिदाकाशरूप बन गया और ब्रह्माजी की उस तरह की स्थिति साक्षात्‌ देखने लगा