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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 71, Verse 20

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 71, verse 20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 71 · श्लोक 20

संस्कृत श्लोक

अप्यन्यगामिपुरुषा रुषाभिहतसद्विजा । अनारतपराक्रन्दपरापर्यन्तपामरा ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीरामजी, क्या कहा जाय, सारी पृथ्वी परधर्म मे प्रवृत्त पुरुषों से व्याप्त हो गई, उसमें धर्मोपदेशक ब्राह्मण क्रोध से आक्रान्त हो गये और निरन्तर दूसरों को दुःख देने में (रुलाने मेँ) तत्पर असीम दुष्टजनों का उत्थान हो गया अर्थात्‌ उस समय पृथ्वी में सभी पुरुष अपना अपना धर्म-कर्म छोडकर दूसरों के धर्म-कर्म मे प्रवृत्त हो गये, स्वधर्म का उपदेश देनेवाले सज्जन पुरुष क्रोध से आक्रान्त हो गये तथा साधारण पामर पुरुष निरन्तर दूसरों को रुलाने में ही तत्पर हो गये