Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 71, Verse 16
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 71, verse 16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 71 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
अट्टशूलाखिलजना शिवशूलचतुष्पथा ।
केशैकशूलवनिता पात्रशूलजनेश्वरा ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, उस समय वहाँ सम्पूर्ण
मनुष्य धान आदि के क्रय -विक्रय आदि व्यवहार से ही अपना निर्वाह करने लग गये, चौमुहानियों
पर शुल्क ही जीवन-साधन बन गया, स्त्रियो का जीवन-साधन केश (जननेन्द्रिय) ही हो गये, ओर
कर ही राजाओं का उपजीव्य (जीवन-साधन) बन गया अथवा अपने अपने वर्ण और आश्रम के
उचित व्यवहारं का अतिक्रमण ही सभी मनुष्यों का व्यसन बन गया चौराहों पर सियार ही क्रन्दन
करने लगे, सत्रियो का केशविन्यास ही व्यसन बन गया, समस्त राजे वेश्या, नर्तकी आदि में ही अपना
समय निकालने लगे