Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 42
46 verse-groups
- Verse 1है । प्रभा ओर आकाश में जैसे कोई प्राणी भेद नहीं दिखा सकता, वैसे ही निर्मल इन दोनों में को…
- Verse 2इस्रीको स्पष्टरूप से कहते हैं । कूटस्थ प्रत्यगात्मारूप आकाश में जो बाह्य और आभ्यन्तर विषय…
- Verse 3जगत् को अपनी सत्ता मे विति से अतिरिक्त दूसरे किसी कारण की अपेक्षा ही नहीं है, इससे भी यह…
- Verse 4हे श्रीरामजी, जैसे जल में द्रवत्व, आकाश में शून्यता और वायु में स्पन्दता है, वैसे ही परब्…
- Verse 5जाग्रत् और स्वप्न अवस्था में जैसे चित्त आदि का आत्मा में हुआ प्रकाश आत्मा से अभिन्न दै,…
- Verse 6जैसे जल में द्रवता, आकाश में शून्यता, वायु में स्पन्दता है, वैसे ही महाचिति में यह जगत्…
- Verse 7स्फृरण में भी चिति से अतिरिक्त किसी अन्य की अपेक्षा नहीं है, इसलिए भी उसका चिति से अभेद ह…
- Verse 8हे श्रीरामजी, यह सारा संसार अविवेक से चमकीला तथा विवेक से नश्वर है । परमार्थ वस्तु का बोध…
- Verse 9तत्वज्ञान से जो निर्णीत हुआ, उका वर्णन करते है / ज्ञानमात्र, शुद्ध, आदि-मध्य और अन्त से र…
- Verse 10उक्त स्वरूप के विषय में वेदों का अनुसरण करनेवाले और न करनेवाले विचारशील वादियों की यथार्थ…
- Verse 11उक्तीमे अनादि अविद्या आदि ्श्यग्रयव का अध्यास होता है, यह कहते हैं । अनन्तस्वरूपचेतनात्मक…
- Verse 12जितने पदार्थ अध्यास से प्रतीत होते हैं उनका प्रकाश अधिष्ठानभूत चैतन्य के बल से ही होता है…
- Verse 13तथा महाचैतन्य के संकल्प से जायमान एवं निरन्तर ब्रह्मसत्ता के बल पर अपनी सत्ता रखनेवाले सृ…
- Verse 14चित् ओर जड़ का द्वैत एवं द्वैत का कारण एकत्व इनका स्वतः अस्तित्व तथा इसी अस्तित्व के आधा…
- Verse 15जैसे वायु और स्पन्दन का भेद शब्दमात्र है, वास्तविक नहीं है, वैसे ही विश्व और विश्वेश्वर क…
- Verse 16जिसमें द्वैत की संभावना नहीं है, जो तीनों काल में सत्स्वरूप ही है और महाचेतनरूप है,वही वि…
- Verse 17अथवा ब्ल्यद्ृष्टि से असत्य भी विश्व की उम्रके कार्यश्रूत छोटे-छोटे देश काल की अपेक्षा बड़…
- Verse 18परन्दु यह तब होता, जब कि कार्य और कारण का भेद पभ्रिद्ध होता, लेकिन वही सिद्ध नहीं है, यह…
- Verse 19जैसे कि आकाश में शून्यता है ओर जैसे जल में द्रवत्व है वैसे ही इस परब्रह्म परमात्मा में वि…
- Verses 20–22ब्रह्म का जो रूप है वही रूप जगत् का भी है, इससे द्वैत और ऐक्य की यहाँ आपत्ति ही नहीं हो…
- Verses 23–24हे श्रीरामचन्द्रजी , प्रतिभारूप ही यह सृष्टि प्रतिभारूप से महाचेतन में ऐसे भासती है, जैसे…
- Verses 25–26श्रावना रुप मन की एकमात्र कल्पना से उत्पन्न संसारभ्रम भावनात्याग एवं कल्यनारहलित स्थिति स…
- Verse 27हे श्रीरामचन्द्रजी, भावना को शान्त करके पाषाण के समान निश्चल होकर तथा चिदेकरस होने से शिल…
- Verse 28उत तरह की स्थिति बनाने के लिए अनुकूल विवेक-कैराग्य आदि साधनो का अभ्या ही आत्मरूप परमेश्वर…
- Verse 29विवेक से पूजित स्वात्मभूत परमात्मा तुरत ही पूजा करनेवाले को निरतिशय आनन्दरूप प्रदान करता…
- Verse 30विचार, शम और सत्संगरूपी बलिदान -पुष्पों से पूजित हुआ परमेश्वर शीघ्र मोक्षफल प्रदान करता ह…
- Verse 31केवल यथार्थ अवलोकनरूप अकेली पूजन सामग्री से जिसकी पूजा की गई हो, ऐसा सर्वोत्तम फल प्रदान…
- Verse 32पूजन द्वारा प्रसन्न हुआ तटस्थ इश्वर तो इस जीव की श्र, सर्फ आरि आदि से भलीभोति रक्षा कर सक…
- Verses 33–34अविवेकियों द्वारा किये यये देवतायूजन आदि सत्कर्मों में अपराध होने की अवश्य संभावना हैं, ऐ…
- Verse 35वह कौन-सा विवेक है, जिसकी आप साधना बतला रहे हैं; इस पर उसे कहते हैं ।/ वास्तविक पदार्थ के…
- Verse 36अपने भीतर शमरूपी अमृत से विवेक को ऐसे धीरे-धीरे बढाना चाहिए, जैसे कि विषयभरान्तियों से वह…
- Verse 37मनुष्य देह की सत्ता का अनादर कर उसमें स्थित तात्त्विक वस्तु का प्रत्यक्ष करे, फिर उससे हो…
- Verse 38देह की सत्ता के अनादर में उपायभूत विवार दिखलाते हैं / शरीर का कारण जगत् और जगत् का भी क…
- Verse 39समस्त विकल्पों से निर्मुक्त विशुद्ध प्रतिभामात्र ही ब्रह्म का स्वरूप है । विकल्प प्रतिभा…
- Verses 40–41जिसमें आत्मतत्त्वरूप श्री प्रतिबिम्बित है ऐसी ज्ञप्ति यानी चिदाभासरूप ज्ञान तब होता है, ज…
- Verse 42आप सक लोगों को वह शिवस्वरूप स्थिति ही प्राप्त करनी चाहिये, यह कहते हैं / इसलिए आप लोग जैस…
- Verse 43ज्ञेय और ज्ञान से शून्य सद्रूप, सत् ओर असत् के सारभूत, आकाशगोलक के समान विशद तथा संसार…
- Verse 44ज्ञानी पुरुष अपनी इच्छा के अनुसार जहाँ चाहे स्थित रहते हैं और जहाँ जाने की इच्छा होती है,…
- Verse 45अथवा निरन्तर समाधि में ही स्थित रहिये, यह कहते हैं । अथवा समस्त इच्छाओं के उत्तम त्याग से…
- Verse 46भद्र, संकल्प की शान्ति हो जाने पर जैसे संकल्पनगर शान्त हो जाता है अथवा जाग्रत्-पुरुष के…
- Verse 47वही तत्वज्ञान निर्वाण में उपयोगी हैं, जो नेत्रवाले पुरुष को हुए रपानुभव के सदश प्रत्यक्ष…
- Verses 48–49अन्धयोलांयूल न्याय से असद् उपदेश से ठगे यये पुरुषों में भी कृतार्थता की भान्ति होती हैं,…
- Verse 50इससे कल्पनात्मक ज्ञान मोक्ष का उपाय नहीं है, तत्त्वो के इस अनुभव को लेकर उपसंहार करते हैं…
- Verse 51इसलिए एवोक्त तत्वज्ञान को ही कासनाविनाशय्यन्त दृढ़ करना चाहिये / वही तत्वज्ञान निर्वाण रू…
- Verse 52इसलिए हे श्रीरामभद्र, मैंने जिस अर्थ का उपदेश दिया है उसे लौकिक या पौराणिक कथार्थ के सदृश…
- Verse 53हे भद्र. उपदेशवचनों से जन्मान्ध पुरुष के रूपानुभव के सदृश परोक्षरूप यदि आपने जाना, तो वह…