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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 42, Verse 19

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 42, verse 19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 42 · श्लोक 19

संस्कृत श्लोक

स्याच्चेत्तत्कल्पनामात्रमेवैतन्नान्यवस्तुता । शून्यता नभसीवात्र द्रवत्वमिव चाम्भसि ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे कि आकाश में शून्यता है ओर जैसे जल में द्रवत्व है वैसे ही इस परब्रह्म परमात्मा में विश्व है । (अत्यन्त अभेद में भी जैसे आकाश में आकाश की रेखा ह“ इस तरह की भेदकल्पना देखी जाती हैं वैसे ही इस जगत्‌ के विष्य में भी होगी, यह कहते हैं 0) अत्यन्त अभेद होने पर भी जैसे आकाश में आकाश की रेखा अज्ञानदृष्टि से देखी जाती है वैसे ही इस परब्रह्म परमात्मा में जगदादि का रूप अज्ञानियों की दृष्टि से देखा जाता है