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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 42, Verses 20–22

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 42, verses 20–22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 42 · श्लोक 20-22

संस्कृत श्लोक

खे खलेखाप्यभिन्नेव किलास्ति जगदादिता । यद्रूपं ब्रह्म तद्रूपं जगत्क्वात्र द्वितैकते ॥ २० ॥ यद्रूपं व्योम तद्रूपमेवं शून्यं किलाखिलम् । एकात्मनि तते स्वच्छे चिन्मात्रे सर्वरूपिणि ॥ २१ ॥ शिलापुत्रकसेनायां पाषाणत्व इवास्थिते । कार्यकारणवैचित्र्यं कथं संभवति क्व वा ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

ब्रह्म का जो रूप है वही रूप जगत्‌ का भी है, इससे द्वैत और ऐक्य की यहाँ आपत्ति ही नहीं हो सकती । आकाश से भिन्न-सी कल्पित शून्य आकाश की रेखा जिस रूप की रहती है यानी रेखाशब्द से वाच्य आकाश जिस रूप का रहता है, ठीक उसी रूप का यह सारा जगत्‌ भी ब्रह्म से भिन्न-सा कल्पित है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। हे श्रीरामचन्द्रजी, एेसी स्थिति में एकात्मा, व्यापक, स्वच्छ चिन्मात्र, सर्वस्वरूप परब्रह्म परमात्मा के, पत्थर में खुदी गई सेना के सदुश पत्थर रूप से स्थित रहते, कार्यकारण की विचित्रता कहाँ कैसे संभव हो सकती है ? द्वितीय का संभव न होने से चिदाकाश में उससे पृथक्‌ किसी दूसरी वस्तु की संभावना नहीं हो सकती