Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 42, Verse 52
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 42, verse 52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 42 · श्लोक 52
संस्कृत श्लोक
आख्यायिकार्थप्रतिभानमेत्य संवेत्स्यचिद्वारि भराद्द्रवात्मा ।
अवेद्यचिद्रूपमशेषमच्छ पश्यन्विनिर्वासि जगत्स्वरूपम् ॥ ५२ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए हे श्रीरामभद्र,
मैंने जिस अर्थ का उपदेश दिया है उसे लौकिक या पौराणिक कथार्थ के सदृश कल्पनामात्ररूप
बहिर्मुखवृत्ति से जानकर आप कृतार्थ मत होंगे, किन्तु एकमात्र वासनाओं की भयंकर बाढ़ से चारों
ओर बह रहे जगद्रूपी अचित् जल को ही देखेंगे तभी मोक्ष में स्थित रहेंगे यानी कृतार्थं होगे