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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 42, Verse 3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 42, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 42 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

निरस्तकरणापेक्षं मरुतः स्पन्दनं यथा । यथा विसरणं भासस्तथा जगदिदं परे ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

जगत्‌ को अपनी सत्ता मे विति से अतिरिक्त दूसरे किसी कारण की अपेक्षा ही नहीं है, इससे भी यह जगत्‌ चितिरूप ही है, इसका दुष्टान्तों से उपयादन करते हैं / किसी कारण की अपेक्षा किये बिना जैसे वायु में स्पन्दन होता है या जैसे सूर्य में प्रभा का प्रसार होता है, वैसे ही परब्रह्म परमात्मा में यह जगत्‌ है