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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 42, Verses 25–26

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 42, verses 25–26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 42 · श्लोक 25,26

संस्कृत श्लोक

काष्ठमौनदशाभासं संसारमवशिष्यते । यथा निमीलिताक्षस्य रूपालोकमनोभ्रमः ॥ २५ ॥ स्वप्ने जाग्रत्यनग्रस्थोऽप्यसन्नेवास्तिभावनात् । तथैवोन्मीलिताक्षस्य रूपालोकमनोभ्रमः ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रावना रुप मन की एकमात्र कल्पना से उत्पन्न संसारभ्रम भावनात्याग एवं कल्यनारहलित स्थिति से ही विनष्ट हो जाता हैं, यह कहते हैं । यद्यपि न तो कुछ वस्तु है और न कोई सामने पदार्थ ही है, तथापि एकमात्र भावना के बल पर आँखें बन्द कर पड़े हुए पुरुष को स्वप्न के जाग्रत्‌काल में जैसे बाह्य ओर आभ्यन्तर विषयों का भ्रम होता है वैसे ही यद्यपि न कुछ वस्तु है न सामने कोई पदार्थ ही है तथापि भावना के बल पर आँखें खुली रखकर बैठे हुए पुरुष को जाग्रद्रप स्वप्न में बाह्य एवं आभ्यन्तर विषयों का भ्रम होता है