Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 42, Verse 14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 42, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 42 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
इत्यत्रार्थोऽभविष्यत्स द्वित्वैकत्वास्तितावशात् ।
कोऽत्र कल्पयिता द्वित्वमेकत्वं वा महाम्बरे ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
चित् ओर जड़ का द्वैत एवं द्वैत का कारण एकत्व इनका स्वतः अस्तित्व तथा
इसी अस्तित्व के आधार पर सृष्टि-भ्रमों का अस्तित्व मानना चाहिए, यह बात मानी जा सकती है,
परन्तु इसमें कोई युक्ति नहीं है, क्योंकि कूटस्थ अद्वितीय चिदाकाश में द्वित्व-एकत्व का कोई
समर्थन करनेवाला नहीं है और जड़ वस्तुओं में तो वैसा समर्थन करनेवाला कोई हो ही नहीं
सकता । (इन सक तर्को से निचोड़ यह निकला कि आकाश के दैत की अग्रश्तिद्धि के सद्रश तथा
स्यन्दन एवं वायु के भेद की अग्रक्िदधि के सद्रथ विश्व और विश्वेश्वर के भेद की भी अग्रश्तिद्धि हैं,
यह कहते हैं /) सम्पूर्ण विश्व असीम, एक परमात्मा का स्वरूपभूत ही है