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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 42, Verse 47

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 42, verse 47 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 42 · श्लोक 47

संस्कृत श्लोक

स्वप्नवच्च प्रबुद्धस्य सदैवास्तं गतं जगत् । सनेत्ररूपानुभवं जातितोऽन्ध इव भ्रमैः ॥ ४७ ॥

हिन्दी अर्थ

वही तत्वज्ञान निर्वाण में उपयोगी हैं, जो नेत्रवाले पुरुष को हुए रपानुभव के सदश प्रत्यक्ष एवं पूणनिन्‍दानुभव तक स्थिर रह सकता है, जन्मान्ध पुरुष की रृपकल्पना के स्रद्ृश परोक्ष-स्रा तत्वज्ञान निर्वाण में उपयोगी नहीं है, यह कहते हैं / कुछ वेदान्तवाक्यों के श्रवण से ही “मैं तत्त्वज्ञ हो गया" इस प्रकार के भ्रम में पड़कर मोक्ष का वर्णन कर रहा अज्ञानी पुरुष, देखनेवाले पुरुष को हुए रूपानुभव का वर्णन कर रहे जन्मान्ध पुरुष के सदुश, अपने भीतर मान-अपमान आदि दुःखों से सन्तप्त रहता है । तत्त्वज्ञ के सदुश भीतर सुख का अनुभव नहीं करता