Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 42, Verse 38
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 42, verse 38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 42 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
लज्जां भयं विषादेर्ष्ये सुखं दुःखं जयेत्समम् ।
जगदादि शरीरादि नास्त्येवादौ कुतोऽद्य तत् ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
देह की सत्ता के अनादर में उपायभूत विवार दिखलाते हैं /
शरीर का कारण जगत् और जगत् का भी कारण पहले ही नहीं रहा, फिर आज वह कहाँ
से रहेगा ? यदि कहो कि “सदेव सोम्येदमग्र आसीत्" इस श्रुति में बतलाया गया ब्रह्मात्मक
कारण तो पहले से ही है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योकि ऐसा मानने पर कार्य यदि कारण
का ही रूप है, तो आखिर में वह ब्रह्मरूप ही सिद्ध होता है, अन्यरूप नहीं