Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 42, Verse 7
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 42, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 42 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
वेत्ति वायुर्यथा स्पन्दं तथा वेत्ति जगच्चितिः ।
न द्वैतैक्यादिभेदानां मनागप्यत्र संभवः ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
स्फृरण में भी चिति से अतिरिक्त किसी अन्य की अपेक्षा नहीं है, इसलिए भी उसका चिति से
अभेद हैं. इस आशय से कहते हैं ।
जैसे वायु स्पन्दन को स्वस्वरूप जानती है वैसे ही चिति भी जगत् को अपना स्वरूप ही
समझती हे । इसलिए द्वैत ओर एेक्य आदि भेदों का यहाँ तनिक भी अवसर नहीं है