Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 42, Verse 5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 42, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 42 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
महाचिति महाकाशे यदिदं भासते जगत् ।
तच्चित्त्वमेव कचति निर्मलत्वं मणाविव ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
जाग्रत् और स्वप्न अवस्था में जैसे चित्त आदि का आत्मा में हुआ प्रकाश आत्मा से अभिन्न दै,
वैसे ब्रह्म में मायाधीन आकाशादि का हुआ प्रकाश भी ब्रह्म से अभिन्न है, इस आशय से उन्हीं
उपयुक्त दृष्टान्तों के द्वारा फिर अभेद का उपपादन करते हैं ।
महाचिद्रूप महाकाश में जो यह जगत् भासता है वह चिद्रूप ही, मणिमें निर्मलता की नाई,
स्फुरित होता है