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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 42, Verse 51

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 42, verse 51 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 42 · श्लोक 51

संस्कृत श्लोक

दुःखदत्वान्निमेषेण भावाभावैषणभ्रमैः । जगद्भ्रमं परिज्ञाय यदवासनमासितम् । विरसाशेषविषयं तद्धि निर्वाणमुच्यते ॥ ५१ ॥

हिन्दी अर्थ

इसलिए एवोक्त तत्वज्ञान को ही कासनाविनाशय्यन्त दृढ़ करना चाहिये / वही तत्वज्ञान निर्वाण रूप बन जाता है इस आशय से कहते हैं / जगद्रूप भ्रम का अच्छी तरह ज्ञानकर जो वासनाशून्य स्थिति होती है वही निर्वाण कहा जाता है, हिरण्यगर्भस्थान तक के समस्त विषय उसकी अपेक्षा नीरस हैं