Guru's AddaGuru's Adda

Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 4

तीसरा सर्ग समाप्त चौथा सर्ग अहन्ता ही संसार का मूल है ।

49 verse-groups

  1. Verse 1इसका आत्मबोध से अनहंभाव की भावना करने पर त्याग हो जाता है, यह वर्णन । सम्पूर्ण दृश्यों का…
  2. Verse 2कर्मो का त्याग वस्तुतः त्याग नहीं कहा गया है, बोध ही मुख्य त्याग कहा गया है । जिसमें जगत्…
  3. Verse 3"पामरजन तक प्रसिद्ध यह देहादि दृश्य प्रपंच ही मैं हूँ" तथा "देहादि से सम्बध्ध यह भोग्य जग…
  4. Verse 4उक्त अर्थ को व्यतिरेक से भी दढ करते हैं “यह देहादिरूप मैं हूँ तथा स्त्री-पुत्र आदि मेरे ह…
  5. Verse 5यह स्त्री, पुत्र, धन आदि सब मेरे हैं , यह शरीर, इन्द्रिय आदि मैं हूँ, सिर्फ इतने अध्यास क…
  6. Verse 6तत्त्वबोध के द्वारा अहमंश के क्षीण हो जाने पर (हे श्रीरामजी, यह आप समझ लीजिए कि) ममता का…
  7. Verse 7अहुद्धि को नष्ट करने में बिलकुल सरल उपाय बतलाते हैं / अहंकार की भावना करनेवाला जीव एकमात्…
  8. Verse 8अनहांबुद्धि भी तो अहंबुद्धि की नाई दैतरूप होने के कारण अध्यास की है, फ़िर वह किससे शान्त…
  9. Verse 9श्रम, श्रमसाधन, भ्रमफल एवं उनके आश्रय सभी ज्ञानमात्र के परिणाम हैं; इसलिए अज्ञान की निवृत…
  10. Verse 10हे श्रीरामजी, यह जो प्रपंच दिखाई दे रहा है, वास्तव में उसे चिन्मात्र ही समझिये । स्वरूपतः…
  11. Verse 11(७) अर्थात्‌ “नेदं रजतम्‌“ (यह रजत नहीं है) इस बुद्धि से रजत के अध्यासबाध में जैसे कोई वि…
  12. Verse 12भद्र, इस तरह निरन्तर अत्यन्त सावधानी से पैदा किये गये अनहंभाव अहंभाव को शीघ्र आकाशपुष्प क…
  13. Verse 13हे रामभद्र, इस रीति से निरन्तर अहन्ता की आकाशपुष्प आदि के सदुश भावना कर रहे आप समस्त सांस…
  14. Verse 14भद्र, स्वाभाविक अज्ञानजनित अहंभाव के ऊपर विजय पाने में जिसकी स्वयं वीरता नहीं है उस पशु क…
  15. Verse 15जिस उत्तम ज्ञानी पुरुष ने सबसे पहले काम, क्रोध आदि छः शत्रुओं के ऊपर विजय पा ली है, वही ब…
  16. Verse 16जो पुरुष अपने अन्दर की मनोवृत्ति को जीत रहा है या जो जीत चुका है वह पुरुष विवेकज्ञान का प…
  17. Verse 17भद्र, समुद्र मे शिला के सदृश जो-जो विषय आपके लिए प्रारब्धवश प्राप्त हो जाये, उन सब विषयों…
  18. Verse 18“भें देहादि विषयरूप नहीं हूँ, ऐसा जानते हुए ओर अनेक तरह की युक्तियों से ज्ञानरूप सुख का अ…
  19. Verse 19युक्ति से विचारने पर जैसे सुवर्ण में कटक आदिरूपता केवल भ्रान्ति को छोडकर कोई भी दूसरी वस्…
  20. Verse 20हजारे युकितयो के प्रदर्शन से कोड प्रयोजन नहीं है केवल वेह्ादि मैं नहीं हूँ. अकेली इस भावन…
  21. Verse 21जिस पुरुष ने सबसे पहले अहंभाव का त्यागकर लोभ, लज्जा, मद और मोह के ऊपर विजय नहीं पाई, वह प…
  22. Verse 22पवन में स्पन्दन के सदृश आपमें जो अहन्ता स्थित है वह आपके परमात्मस्वरूप बन जाने पर वायु मे…
  23. Verse 23कूटस्थ अद्वितीय चैतन्यमात्र के ज्ञान से परमात्मा मेँ जब संसार एकरूप से मिल जाता है तब वह…
  24. Verse 24यदि आत्मज्ञान से जीव और जग्रत्‌ की परमात्सरूप अवयवी के रूप में उत्पत्ति आपने मान ली, तो उ…
  25. Verse 25तत्त्वज्ञान से ज्ञाता, ज्ञेय ज्ञानरूप त्रिपुटी का बाध हो जाने पर त्रिपुटीजनित जीव का विना…
  26. Verse 26दीप के निर्वाण के समान आभा सहित अविद्या का फल निर्वाण अप्वा ज्ञान का उत्पन्न हुआ / यह अवश…
  27. Verse 27अनल्भावना असह्य है. इसका खण्डन करते हैं / जब शस्त्रो के आघात सहे जाते हैं, जब व्याधियों क…
  28. Verse 28जितने जगत्‌ के पदार्थ है, उन सबका अविनाशी कारण देहादि में अहंभाव रखना ही हे । ज्ञान द्वार…
  29. Verse 29निःसार भी मुख के वाष्प से जैसे परम स्वच्छ दर्पण मलिन हुआ प्रतीत होता है वैसे ही परमात्मार…
  30. Verse 30परमात्मारूप वायु में अहंकाररूप स्पन्द है । उसे शान्त होने पर अनिर्देश्य, अनाभास, अज और अव…
  31. Verse 31बाह्य अनर्थो के अवलोकन में भी अहंकार ही हेतु है, यह कहते हैं । अहंकार सामने उपस्थित द्रव्…
  32. Verse 32अहंकाररूपी मेघ के छिन्न-भिन्न हो जाने पर परमार्थरूप शरत्काल का आकाश, सर्वोत्तम, स्वच्छ अस…
  33. Verse 33हे श्रीरामचन्द्रजी, जो विशुद्ध सुवर्णरूप चिरकालिक चैतन्य है, वह अहंकाररूप मल के सम्पर्कं…
  34. Verse 34यदि आप यह के कि अहंकार की निवृत्ति हो जाने फर किस नाम से मेरा उपदेश होगा, तो इस पर मेरा क…
  35. Verse 35अहंकार निवृत्ति के बाद ब्रह्म आदि नाम से जो जीव का व्यवहार होता है वह भी अन्य पद के अर्थ…
  36. Verse 36अहंकार ही जन्ममरण रूप इस संसार का बीज है । भावना के मूल अज्ञान के नाश से जब यह अहंकाररूपी…
  37. Verse 37स्र संसार का कीज अहंकार ही हे, इसका उपपादन करने के निष यह केसे उदित होता ॐ“ यह बतलाते हैं…
  38. Verse 38इसलिए अहंकाररूपी बीज से यह दृश्यप्रपंच की सत्तारूपी बिम्ब लता उदित हुई है। जिसमें व्यष्टि…
  39. Verse 39इसीका विस्तृतरूप से वर्णन करते हैं । इस अहमर्थरूपी मिर्च के बीज के भीतर पर्वतों, समुद्रों…
  40. Verse 40अन्तरिक्ष, पृथिवी, वायु, आकाश, पर्वत, नदियाँ और दिशाएँ ये सबके सब अहमर्थरूपी विकसित कुसुम…
  41. Verse 41सुमेरु के परभाग में सद्रूप दिन उदित होते ही सद्रूप पदार्थ का प्रकाश और मनन जैसे करता है व…
  42. Verse 42प्रारम्भ होते ही दिन जैसे पदार्थों को प्रकाशित करता है वैसे ही प्रारम्भ होते ही अहंकारभाव…
  43. Verse 43ब्रह्मरूपी जल में अहंकाररूपी तेल का बिन्दु पड़ते ही जो चारों ओर फैल जाता है वही शीघ्र यह…
  44. Verse 44जिस तरह खराब आँखें खुली रहकर असद्रूप जगत्‌ को सत्यरूप से खूब अनुभव करती है । किन्तु बन्द…
  45. Verse 45सांसारिक पदार्थों का अनुभव नहीं कर पाती; वैसे ही अहमर्थ के प्रसृत होने पर ही यह संसार अनु…
  46. Verse 46नित्य परमात्मज्ञान से अहमंश के बिलकुल नि:शेष कर दिये जाने पर यह संसाररूपी मृगजल पूर्णरूप…
  47. Verse 47साधन ओर फल दोनों अतिद्युलभ हैं; यह द्खिलाते हैं / स्वप्रकाश चिदात्मा की एकमात्र भावना से…
  48. Verse 48किसी दूसरे पुरुष आदि बाह्य साधन की अपेक्षा न होने सते भी इसको अतिहुलभ बतलाते हैं / हे निष…
  49. Verse 49सम्पूर्ण उपदेश चिद्धान्तो का सार संक्षेपत्प से दिखलाते हुए अब उपसंहार करते हैं / हे श्रीर…