Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 4
तीसरा सर्ग समाप्त चौथा सर्ग अहन्ता ही संसार का मूल है ।
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- Verse 1इसका आत्मबोध से अनहंभाव की भावना करने पर त्याग हो जाता है, यह वर्णन । सम्पूर्ण दृश्यों का…
- Verse 2कर्मो का त्याग वस्तुतः त्याग नहीं कहा गया है, बोध ही मुख्य त्याग कहा गया है । जिसमें जगत्…
- Verse 3"पामरजन तक प्रसिद्ध यह देहादि दृश्य प्रपंच ही मैं हूँ" तथा "देहादि से सम्बध्ध यह भोग्य जग…
- Verse 4उक्त अर्थ को व्यतिरेक से भी दढ करते हैं “यह देहादिरूप मैं हूँ तथा स्त्री-पुत्र आदि मेरे ह…
- Verse 5यह स्त्री, पुत्र, धन आदि सब मेरे हैं , यह शरीर, इन्द्रिय आदि मैं हूँ, सिर्फ इतने अध्यास क…
- Verse 6तत्त्वबोध के द्वारा अहमंश के क्षीण हो जाने पर (हे श्रीरामजी, यह आप समझ लीजिए कि) ममता का…
- Verse 7अहुद्धि को नष्ट करने में बिलकुल सरल उपाय बतलाते हैं / अहंकार की भावना करनेवाला जीव एकमात्…
- Verse 8अनहांबुद्धि भी तो अहंबुद्धि की नाई दैतरूप होने के कारण अध्यास की है, फ़िर वह किससे शान्त…
- Verse 9श्रम, श्रमसाधन, भ्रमफल एवं उनके आश्रय सभी ज्ञानमात्र के परिणाम हैं; इसलिए अज्ञान की निवृत…
- Verse 10हे श्रीरामजी, यह जो प्रपंच दिखाई दे रहा है, वास्तव में उसे चिन्मात्र ही समझिये । स्वरूपतः…
- Verse 11(७) अर्थात् “नेदं रजतम्“ (यह रजत नहीं है) इस बुद्धि से रजत के अध्यासबाध में जैसे कोई वि…
- Verse 12भद्र, इस तरह निरन्तर अत्यन्त सावधानी से पैदा किये गये अनहंभाव अहंभाव को शीघ्र आकाशपुष्प क…
- Verse 13हे रामभद्र, इस रीति से निरन्तर अहन्ता की आकाशपुष्प आदि के सदुश भावना कर रहे आप समस्त सांस…
- Verse 14भद्र, स्वाभाविक अज्ञानजनित अहंभाव के ऊपर विजय पाने में जिसकी स्वयं वीरता नहीं है उस पशु क…
- Verse 15जिस उत्तम ज्ञानी पुरुष ने सबसे पहले काम, क्रोध आदि छः शत्रुओं के ऊपर विजय पा ली है, वही ब…
- Verse 16जो पुरुष अपने अन्दर की मनोवृत्ति को जीत रहा है या जो जीत चुका है वह पुरुष विवेकज्ञान का प…
- Verse 17भद्र, समुद्र मे शिला के सदृश जो-जो विषय आपके लिए प्रारब्धवश प्राप्त हो जाये, उन सब विषयों…
- Verse 18“भें देहादि विषयरूप नहीं हूँ, ऐसा जानते हुए ओर अनेक तरह की युक्तियों से ज्ञानरूप सुख का अ…
- Verse 19युक्ति से विचारने पर जैसे सुवर्ण में कटक आदिरूपता केवल भ्रान्ति को छोडकर कोई भी दूसरी वस्…
- Verse 20हजारे युकितयो के प्रदर्शन से कोड प्रयोजन नहीं है केवल वेह्ादि मैं नहीं हूँ. अकेली इस भावन…
- Verse 21जिस पुरुष ने सबसे पहले अहंभाव का त्यागकर लोभ, लज्जा, मद और मोह के ऊपर विजय नहीं पाई, वह प…
- Verse 22पवन में स्पन्दन के सदृश आपमें जो अहन्ता स्थित है वह आपके परमात्मस्वरूप बन जाने पर वायु मे…
- Verse 23कूटस्थ अद्वितीय चैतन्यमात्र के ज्ञान से परमात्मा मेँ जब संसार एकरूप से मिल जाता है तब वह…
- Verse 24यदि आत्मज्ञान से जीव और जग्रत् की परमात्सरूप अवयवी के रूप में उत्पत्ति आपने मान ली, तो उ…
- Verse 25तत्त्वज्ञान से ज्ञाता, ज्ञेय ज्ञानरूप त्रिपुटी का बाध हो जाने पर त्रिपुटीजनित जीव का विना…
- Verse 26दीप के निर्वाण के समान आभा सहित अविद्या का फल निर्वाण अप्वा ज्ञान का उत्पन्न हुआ / यह अवश…
- Verse 27अनल्भावना असह्य है. इसका खण्डन करते हैं / जब शस्त्रो के आघात सहे जाते हैं, जब व्याधियों क…
- Verse 28जितने जगत् के पदार्थ है, उन सबका अविनाशी कारण देहादि में अहंभाव रखना ही हे । ज्ञान द्वार…
- Verse 29निःसार भी मुख के वाष्प से जैसे परम स्वच्छ दर्पण मलिन हुआ प्रतीत होता है वैसे ही परमात्मार…
- Verse 30परमात्मारूप वायु में अहंकाररूप स्पन्द है । उसे शान्त होने पर अनिर्देश्य, अनाभास, अज और अव…
- Verse 31बाह्य अनर्थो के अवलोकन में भी अहंकार ही हेतु है, यह कहते हैं । अहंकार सामने उपस्थित द्रव्…
- Verse 32अहंकाररूपी मेघ के छिन्न-भिन्न हो जाने पर परमार्थरूप शरत्काल का आकाश, सर्वोत्तम, स्वच्छ अस…
- Verse 33हे श्रीरामचन्द्रजी, जो विशुद्ध सुवर्णरूप चिरकालिक चैतन्य है, वह अहंकाररूप मल के सम्पर्कं…
- Verse 34यदि आप यह के कि अहंकार की निवृत्ति हो जाने फर किस नाम से मेरा उपदेश होगा, तो इस पर मेरा क…
- Verse 35अहंकार निवृत्ति के बाद ब्रह्म आदि नाम से जो जीव का व्यवहार होता है वह भी अन्य पद के अर्थ…
- Verse 36अहंकार ही जन्ममरण रूप इस संसार का बीज है । भावना के मूल अज्ञान के नाश से जब यह अहंकाररूपी…
- Verse 37स्र संसार का कीज अहंकार ही हे, इसका उपपादन करने के निष यह केसे उदित होता ॐ“ यह बतलाते हैं…
- Verse 38इसलिए अहंकाररूपी बीज से यह दृश्यप्रपंच की सत्तारूपी बिम्ब लता उदित हुई है। जिसमें व्यष्टि…
- Verse 39इसीका विस्तृतरूप से वर्णन करते हैं । इस अहमर्थरूपी मिर्च के बीज के भीतर पर्वतों, समुद्रों…
- Verse 40अन्तरिक्ष, पृथिवी, वायु, आकाश, पर्वत, नदियाँ और दिशाएँ ये सबके सब अहमर्थरूपी विकसित कुसुम…
- Verse 41सुमेरु के परभाग में सद्रूप दिन उदित होते ही सद्रूप पदार्थ का प्रकाश और मनन जैसे करता है व…
- Verse 42प्रारम्भ होते ही दिन जैसे पदार्थों को प्रकाशित करता है वैसे ही प्रारम्भ होते ही अहंकारभाव…
- Verse 43ब्रह्मरूपी जल में अहंकाररूपी तेल का बिन्दु पड़ते ही जो चारों ओर फैल जाता है वही शीघ्र यह…
- Verse 44जिस तरह खराब आँखें खुली रहकर असद्रूप जगत् को सत्यरूप से खूब अनुभव करती है । किन्तु बन्द…
- Verse 45सांसारिक पदार्थों का अनुभव नहीं कर पाती; वैसे ही अहमर्थ के प्रसृत होने पर ही यह संसार अनु…
- Verse 46नित्य परमात्मज्ञान से अहमंश के बिलकुल नि:शेष कर दिये जाने पर यह संसाररूपी मृगजल पूर्णरूप…
- Verse 47साधन ओर फल दोनों अतिद्युलभ हैं; यह द्खिलाते हैं / स्वप्रकाश चिदात्मा की एकमात्र भावना से…
- Verse 48किसी दूसरे पुरुष आदि बाह्य साधन की अपेक्षा न होने सते भी इसको अतिहुलभ बतलाते हैं / हे निष…
- Verse 49सम्पूर्ण उपदेश चिद्धान्तो का सार संक्षेपत्प से दिखलाते हुए अब उपसंहार करते हैं / हे श्रीर…