Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 4, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 4, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 4 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
अयं सोहमिदं तन्मे शान्तमित्येव यस्य नो ।
न ज्ञानं तस्य नो शान्तिर्न त्यागो न च निर्वृतिः ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त अर्थ को व्यतिरेक से भी दढ करते हैं
“यह देहादिरूप मैं हूँ तथा स्त्री-पुत्र आदि मेरे हैं” इस प्रकार का अध्यासरूप संसार जिसका
शान्त नहीं है उसे न ज्ञान है, न शान्ति है, न त्याग ही है और न निवृति यानी मोक्षरूप सुख ही
है