Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 4, Verse 47
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 4, verse 47 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 4 · श्लोक 47
संस्कृत श्लोक
स्वसंविद्भावनामात्रसाध्येऽस्मिन्वरवस्तुनि ।
सिद्धमात्रात्मनि स्वैरं मा खेदं गच्छमा भ्रमीम् ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
साधन ओर फल दोनों अतिद्युलभ हैं; यह द्खिलाते हैं /
स्वप्रकाश चिदात्मा की एकमात्र भावना से साध्य (&) स्वतःसिद्ध (५) आत्मरूप इस श्रेष्ठ
वस्तु की प्राप्ति में श्रीरामजी, आप निरंकुश खेद या अहंभावादि भ्रान्ति को प्राप्त न हों