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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 4, Verse 37

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 4, verse 37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 4 · श्लोक 37

संस्कृत श्लोक

सद्ब्रह्म शिवमात्मेति परे नामकलङ्किता । उदेत्यहन्ता कुम्भत्वादिव मृद्धातुविस्मृतिः ॥ ३७ ॥

हिन्दी अर्थ

स्र संसार का कीज अहंकार ही हे, इसका उपपादन करने के निष यह केसे उदित होता ॐ“ यह बतलाते हैं / सत्‌, ब्रह्म, शिव, आत्मा, यानी त्रिकालअबाधित, अपरिच्छिन्न, निरतिशयानन्द अपरोक्ष चिदेकरस इन स्वभावों से युक्त परमात्मा में सत्‌ आदि चारों स्वभावों के संकोचरूप नाम से कलंकित यानी मालिन्ययुक्त, समष्टि-अहन्ता ऐसी उदित होती है जैसी घटाकारपरिच्छेद से मिट्टी की स्वभाव विस्मृति