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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 4, Verse 11

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 4, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 4 · श्लोक 11

संस्कृत श्लोक

येनैवाशु निमेषेण त्वहमित्येव चेतति । तेनैव नाहमित्येव चेतित्वाशु न शोच्यते ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

(७) अर्थात्‌ “नेदं रजतम्‌“ (यह रजत नहीं है) इस बुद्धि से रजत के अध्यासबाध में जैसे कोई विघ्न नहीं है । जब-जब अहंभाव का उदय प्राप्त हो तब-तब उरी समय में अहंभाव विरोधिनी अनहंभावडुद्धि पैदा करना चाहिए, यह कहते हैं / जिस कारणसामग्री से निमेषमात्र में शीघ्र अहंबुद्धि उत्पन्न होती है उस सामग्री से विरुद्ध तत्काल अनहंभाव का उत्पादन कर पुरुष किसी प्रकार के शोक से सन्तप्त नहीं होता