Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 4, Verse 31
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 4, verse 31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 4 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
अहमर्थः पुरो द्रव्यप्रतिबिम्बप्रदश्चिति ।
तच्छान्तौ सा निराभासमनन्तमजमव्ययम् ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
बाह्य अनर्थो के अवलोकन में भी अहंकार ही हेतु है, यह कहते हैं ।
अहंकार सामने उपस्थित द्रव्यं का चिति में प्रतिबिम्ब प्रदान करता है । उस अहंकार के शान्त
हो जाने पर वह चिति निराभास, अनन्त, अज ओर अविनाशी परमात्मस्वरूप ही रह जाती
हे