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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 4, Verse 44

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 4, verse 44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 4 · श्लोक 44

संस्कृत श्लोक

उन्मेषमात्रेणाहन्ता जगन्त्यनुभवत्यहो । न निमेषेण दृगिव सत्यानीत्यप्यसन्त्यलम् ॥ ४४ ॥

हिन्दी अर्थ

जिस तरह खराब आँखें खुली रहकर असद्रूप जगत्‌ को सत्यरूप से खूब अनुभव करती है । किन्तु बन्द हो जाते ही नहीं करती; अहो, उसी तरह उन्मेष मात्र से यह अहन्ता असद्रूप जगत्‌ को सत्यरूप से अनुभव करती है