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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 4, Verse 23

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 4, verse 23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 4 · श्लोक 23

संस्कृत श्लोक

असर्गसंविदा सर्गः परेऽस्तोऽतिविराजते । संनिवेशविशेषेण दुरर्थोऽपि हि शोभते ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

कूटस्थ अद्वितीय चैतन्यमात्र के ज्ञान से परमात्मा मेँ जब संसार एकरूप से मिल जाता है तब वह बहुत ही भला लगता है । ठीक ही है कि माला में भ्रान्ति से कल्पित सर्प आदि भयंकर अर्थ जब माला के ज्ञान से मालास्वरूप हो जाते है तब मालारूप से कण्ठ में धारण करने पर सुन्दर लगते ही है